अतीत से......

अतीत से......

भूमिका

संस्मरण केवल बीते समय का विवरण मात्र नहीं होते, वे जीवन के उन अनमोल क्षणों का पुनर्जीवन होते हैं जो समय के साथ धुंधले तो पड़ जाते हैं, पर मन की स्मृतियों में सदैव जीवित रहते हैं। जब वर्तमान किसी पुराने अनुभव से टकराता है, तब मन अनायास ही अतीत की गलियों में लौट जाता है और वही क्षण फिर से सांस लेने लगते हैं।

विजया डालमिया का यह संस्मरण भी ऐसे ही भावों का सजीव चित्र है, जहाँ एक दादी अपने छह माह के पोते के साथ ट्रेन यात्रा करते हुए अचानक तीस वर्ष पीछे लौट जाती है। यह केवल एक यात्रा का विवरण नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बीच भावनाओं की निरंतरता का दस्तावेज़ है। इसमें माँ और दादी के अनुभवों के बीच का सूक्ष्म अंतर भी है और वह समानता भी, जो हर युग में बच्चों के प्रति प्रेम, चिंता और अपनत्व को एक-सा बनाए रखती है।

इस संस्मरण को रचने का ध्येय केवल स्मृतियों को शब्द देना नहीं, बल्कि यह बताना भी है कि समय बदलता है, साधन बदलते हैं, परिस्थितियाँ बदलती हैं—पर रिश्तों की ऊष्मा और बच्चों के प्रति स्नेह का स्वर कभी नहीं बदलता। संस्मरण हमें यह समझने का अवसर देते हैं कि जीवन के साधारण दिखने वाले क्षण ही आगे चलकर सबसे असाधारण यादों में बदल जाते हैं।

पाठकों के लिए ऐसे संस्मरण इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे हमें अपने जीवन की अनदेखी संवेदनाओं से जोड़ते हैं। वे सिखाते हैं कि अनुभवों को संजोना केवल याद रखना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक भावनाओं की विरासत पहुँचाना भी है।

संस्मरण

ट्रेन वही... सफर वही... दूरी वही... बस बदला है तो वक्त!

ट्रेन वही... सफर वही... दूरी वही... बस बदला है तो वक्त! जिसने याद दिला दिया कि... एक वो था बचपन और एक ये है बचपन। तीस साल का अंतराल कम नहीं होता, लेकिन कल जब मैं अपने छह माह के पोते के साथ एक सफर पर निकली, तो मुझे तीस साल पुरानी बातें पल-पल याद आने लगीं। तब और अब के सफर में क्या समानता है और क्या कुछ अलग—मैं इसे कलमबद्ध कर रही हूँ।

अपने बच्चों से लेकर उसके बच्चे तक के साथ ट्रेन का सफर कितना रोमांचक और खूबसूरत होता है, यह मैंने कल महसूस किया, जब बीते कल की बातें हूबहू मेरे सामने आईने की तरह खड़ी थीं। उनमें मैं साफ-साफ अपने बेटे का बचपन, अपने पोते के माध्यम से देख-देखकर खुश हो रही थी। बस फर्क इतना ही था कि तब मेरी फीलिंग कुछ अलग-सी थी—थोड़ी-सी सहमी हुई और थोड़ी-सी परेशान।

माँ बनने के बाद जब बच्चे को लेकर मैं पहली बार ट्रेन में बैठी, तब इतने लोग होने के बावजूद भी मुझे अकेलेपन का एहसास था। बच्चे की जिम्मेदारी मेरी है और... नजर चूकी कि दुर्घटना घटी—यह वाली बात हर पल मेरे साथ-साथ सफर करती रही। हालांकि मेरे पति भी बच्चों को बहुत संभालते थे, पर माँ होने के नाते जब तक बच्चा छोटा होता है, तब तक माँ की जिम्मेदारियाँ कुछ ज्यादा होती हैं। बच्चे के हर क्रियाकलाप को ध्यान से देखकर उसे अंजाम देना—इसी में सफर कट जाता था। उसकी प्यार भरी मुस्कराहट दिल को हर पल तरोताजा रखती थी।

जब अपने छह महीने के पोते के साथ पहली बार ट्रेन का सफर किया, तो वह सारी यादें ताजा हो गईं। पोते ने भी अपने मम्मी-पापा के साथ-साथ दादा-दादी और ताऊ के साथ ट्रेन में पहला सफर किया। इतना ज्यादा एक्साइटेड और हाइपर एक्टिव हो रखा था कि क्या बताऊँ! उसके लिए सब कुछ नया-नया था और मेरे लिए अपने बेटे के बचपन को फिर से देखने का सुनहरा मौका।

इतिहास खुद को दोहरा रहा था और उसके हर पन्ने में मैं खुद को पा रही थी—अपने ही अंदाज में। बस माँ और दादी में कुछ खास फर्क नहीं होता, सिवाय इसके कि दादी की सहनशीलता ज्यादा बढ़ जाती है, क्योंकि जिम्मेदारियाँ थोड़ी-सी कम हो जाती हैं।

वो इंजन की सीटी पर उसका चमकना और मेरा उसे अपने से कसकर चिपका लेना... उसके कान पर अपना हाथ रख देना, और उसका तुरंत फिर से एक्टिव हो जाना... चमकती लाइट्स को देखकर उन्हें पकड़ने के लिए उसका लपकना... वह कहीं गिर न जाए, यह सोचकर मेरा उसे कसकर थाम लेना—कुछ भी तो नहीं बदला था।

सच है... कुछ बातें और अनुभव कभी नहीं बदलते। हाँ, एहसास भिन्न हो सकते हैं, पर “बच्चों के साथ बच्चा बनकर ही रहा जा सकता है”—यह बात तब भी थी और आज भी है।

सूचना स्रोत 

विजया डालमिया

राष्ट्रीय संयोजिका 

उलझन सुलझन, महिला लेखक विंग

हैदराबाद (तेलंगाना)

पाठ्य उन्नयन और विस्तार 




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