अनूठा गांव जहां एक ही मालिक है - डॉ. सत्यनारायण
हम राजस्थानी •
अनूठा गांव जहां एक ही मालिक है
ब्यावर के देवमाली गांव में तीन हजार सदस्यों का कुनबा
डॉ. सत्यनारायण (साहित्यकार)
ब्यावर जिले की मसूदा पंचायत समिति से 7-8 किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में एक गांव देवमाली। कच्ची मिट्टी की ईंटों से बने कुल तीन सौ घर। तीन हजार की आबादी। एक ही जाति गुर्जर। एक ही गौत्र लावणा। एक ही कुनबा। एक ही पुरखा। एक ही पारिवारिक बेल जो फलती-फूलती तीन सौ घरों तक फैल गई। एक ही खेत। एक ही मालिक देवनारायण। उनके एक ही सेवक नादाजी। उन्हीं नादाजी के वंशज हैं इस गांव के बाशिंदे। ग्यारहवीं शताब्दी का पूवार्द्ध। राजस्थान की सबसे बड़ी लोक महागाथा "बगड़ावत भारत" के नायक सवाई भोज अपने भाइयों सहित राण के राजा दुर्जनशाल के साथ युद्ध में मारे गए। सवाई भोज की पत्नी साडू अपने पुत्र देवनारायण को लेकर अपने पीहर मालवा चली गईं। एक दिन देवनारायण को कवि छोछू भाट ने पिता व काका-ताऊ की गाथा गाकर सुनाई कि जैमती द्वारा सवाई भोज से प्रेम व विवाह के कारण राण के राजा के साथ युद्ध में वे मारे गए। सभी चौबीस बगड़ावत भाइयों के खेडे उजड़ गए।
साडू माता के मना करने के बावजूद देवनारायण मालवा से मेवाड़ में देवमाली स्थित पहाड़ी पर आते हैं। कहा जाता है, उनके स्वागत में पहाड़ी की तमाम शिलाएं एक तरफ झुक गईं। लोकगीत की पंक्तियां हैं -
देवमाली देव पधार्या, शिला झुकझुक कहीं जोहार।
दरख्त हरे से और हरे हो उठे। उन्होंने जहाँ विश्राम किया वहाँ सात शिलाओं की चौफेर दीवार है, तो शिला की ही छत। यहीं से उन्होंने किसानों को एकत्र कर छापामार युद्ध द्वारा अपने बडेरों का बदला लिया। यह पहला किसान आंदोलन था। एक हजार साल बाद आज भी अपनी मान्यताओं पर अडिग यह गांव नहीं बल्कि संयुक्त परिवार है जो अपने पुरखे नादा जी की आन को निभा रहा है।
यहाँ की बनी में से कोई दरख्त तो क्या उसकी डाली व पहाड़ी का एक भी पत्थर इस क्षेत्र की सीमा से बाहर नहीं ले जा सकता। पीढ़ी दर पीढ़ी साढ़े तीन हजार बीघा जमीन भाइयों में बंटती रही। एक हजार साल पहले देवनारायण के नाम थी। आज भी है। खेती बाड़ी के अलावा आय का साधन गाय, भेड़, बकरी हैं। शराब, मांस, वर्जित है। कभी कोई लड़ाई झगड़ा नहीं तो पुलिस में एफआईआर भी नहीं होती। इसीलिए गरीच हैं पर शादी-ब्याह आसानी से हो जाते हैं। हर कोई यहां अपनी बहन-बेटी ब्याहना चाहता है। "क्या कभी किसी ने पक्का मकान बनाने की कोशिश की?" पूछने पर ओमप्रकाश अपने दोनों कानों पर हाथ धरते हुए बोला- "एक ने कोशिश की पर ऐसी आपदा आई कि पूरा नहीं बन सका।" गांव में बिजली है पर खेत कुओं पर नहीं। क्योंकि जमीन देवनारायण के नाम है। सरकार को तो उनका अंगूठा भी चाहिए, दस्तखत भी, फोटो भी। अब न नादा जी है न देवनारायण जी।
ओमप्रकाश बताता है कि कुछ लोग बाहर रहने के कारण शहर में पक्के घर बनवाने लगे हैं पर वहां भी वे मालिक नहीं बल्कि देवनारायण के किरायेदार बनकर ही रहते हैं। उसका तय किराया मंदिर में चढ़ाना पड़ता है। मंदिर का चढ़ावा भी सभी मिलकर तय करते हैं। कोई भी व्यक्तिगत खर्च नहीं कर सकता। कवि छोछू भाट की गाई बगड़ावत गाथा सभी को याद है। याद ही नहीं गांव में कई जोट हैं जो देव छठ व खास अवसरों पर फड़ बांचते गाते हैं। पहाड़ी पर कवि की विशाल प्रतिमा भी है।
"एक ही परिवार का गांव है देवमाली। कोई चोरी-चकारी नहीं। घर गुवाड़ी के टाटी डालकर चल देते हैं खेतों में, बनी में। जो थोड़ा बहुत कमाते हैं उसी में समायी।" साथी गोपाल घ्याणा के बोलों में संतुष्टि का भाव था। मुझे औचक विश्व के सबसे खुशहाल और हंसमुख देश भूटान का स्मरण हो आया। जब से देवमाली आया हूँ यही भाव यहाँ के बाशिंदों के चेहरों पर तैरता पाया।
(लेखक जोधपुर विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के प्रोफेसर हैं और ये लेखक के अपने विचार हैं तथा उन्हीं के द्वारा उलझन सुलझन को प्रेषित।)
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